महाभारत 9.58.2
उन्मत्तमिव मातङ्गं सिंहेन विनिपातितम्ददृशुर्हृष्टरोमाणः सर्वे ते चापि सोमकाः
unmattamiva mātaṅgaṃ siṃhena vinipātitamdadṛśurhṛṣṭaromāṇaḥ sarve te cāpi somakāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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