महाभारत 9.60.8
इन्द्रेणेव हि वृत्रस्य वधं परमसंयुगेत्वया कृतममन्यन्त शत्रोर्वधमिमं जनाः
indreṇeva hi vṛtrasya vadhaṃ paramasaṃyugetvayā kṛtamamanyanta śatrorvadhamimaṃ janāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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