ऋग्वेद 1.100.9
स स॒व्येन॑ यमति॒ व्राध॑तश्चि॒त् स द॑क्षि॒णे संगृ॑भीता कृ॒तानि॑ ।स की॒रिणा॑ चि॒त् सनि॑ता॒ धना॑नि म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥
sa savyena yamati vrādhataścit sa dakṣiṇe saṃgṛbhītā kṛtāni |sa kīriṇā cit sanitā dhanāni marutvān no bhavatvindra ūtī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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