ऋग्वेद 1.116.19
र॒यिं सु॑क्ष॒त्रं स्व॑प॒त्यमायु॑: सु॒वीर्यं॑ नासत्या॒ वह॑न्ता ।आ ज॒ह्नावीं॒ सम॑न॒सोप॒ वाजै॒स्त्रिरह्नो॑ भा॒गं दध॑तीमयातम्॥
rayiṃ sukṣatraṃ svapatyamāyu: suvīryaṃ nāsatyā vahantā |ā jahnāvīṃ samanasopa vājaistrirahno bhāgaṃ dadhatīmayātam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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