ऋग्वेद 1.116.20
परि॑विष्टं जाहु॒षं वि॒श्वत॑: सीं सु॒गेभि॒र्नक्त॑मूहथू॒ रजो॑भिः ।वि॒भि॒न्दुना॑ नासत्या॒ रथे॑न॒ वि पर्व॑ताँ अजर॒यू अ॑यातम्॥
pariviṣṭaṃ jāhuṣaṃ viśvata: sīṃ sugebhirnaktamūhathū rajobhiḥ |vibhindunā nāsatyā rathena vi parvatām̐ ajarayū ayātam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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