ऋग्वेद 1.116.24
दश॒ रात्री॒रशि॑वेना॒ नव॒ द्यूनव॑नद्धं श्नथि॒तम॒प्स्व १न्तः ।विप्रु॑तं रे॒भमु॒दनि॒ प्रवृ॑क्त॒मुन्नि॑न्यथु॒: सोम॑मिव स्रु॒वेण॑॥
daśa rātrīraśivenā nava dyūnavanaddhaṃ śnathitamapsva 1ntaḥ |viprutaṃ rebhamudani pravṛktamunninyathu: somamiva sruveṇa ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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