ऋग्वेद 1.122.10
स व्राध॑तो॒ नहु॑षो॒ दंसु॑जूत॒: शर्ध॑स्तरो न॒रां गू॒र्तश्र॑वाः ।विसृ॑ष्टरातिर्याति बाह्ल॒सृत्वा॒ विश्वा॑सु पृ॒त्सु सद॒मिच्छूर॑:॥
sa vrādhato nahuṣo daṃsujūta: śardhastaro narāṃ gūrtaśravāḥ |visṛṣṭarātiryāti bāhlasṛtvā viśvāsu pṛtsu sadamicchūra: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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