ऋग्वेद 1.181.2
आ वा॒मश्वा॑स॒: शुच॑यः पय॒स्पा वात॑रंहसो दि॒व्यासो॒ अत्या॑: ।म॒नो॒जुवो॒ वृष॑णो वी॒तपृ॑ष्ठा॒ एह स्व॒राजो॑ अ॒श्विना॑ वहन्तु॥
ā vāmaśvāsa: śucayaḥ payaspā vātaraṃhaso divyāso atyā: |manojuvo vṛṣaṇo vītapṛṣṭhā eha svarājo aśvinā vahantu ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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