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ऋग्वेद 1.25.3
वि मृ॑ळी॒काय॑ ते॒ मनो॑ र॒थीरश्वं॒ न संदि॑तम् ।गी॒र्भिर्व॑रुण सीमहि॥
vi mṛḷīkāya te mano rathīraśvaṃ na saṃditam |gīrbhirvaruṇa sīmahi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंवि मृ॑ळी॒काय॑ ते॒ मनो॑ र॒थीरश्वं॒ न संदि॑तम् ।गी॒र्भिर्व॑रुण सीमहि॥
vi mṛḷīkāya te mano rathīraśvaṃ na saṃditam |gīrbhirvaruṇa sīmahi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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