ऋग्वेद 10.137.2
द्वावि॒मौ वातौ॑ वात॒ आ सिन्धो॒रा प॑रा॒वत॑: ।दक्षं॑ ते अ॒न्य आ वा॑तु॒ परा॒न्यो वा॑तु॒ यद्रप॑:॥
dvāvimau vātau vāta ā sindhorā parāvata: |dakṣaṃ te anya ā vātu parānyo vātu yadrapa: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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