ऋग्वेद 10.22.15
पिबा॑पि॒बेदि॑न्द्र शूर॒ सोमं॒ मा रि॑षण्यो वसवान॒ वसु॒: सन् ।उ॒त त्रा॑यस्व गृण॒तो म॒घोनो॑ म॒हश्च॑ रा॒यो रे॒वत॑स्कृधी नः॥
pibāpibedindra śūra somaṃ mā riṣaṇyo vasavāna vasu: san |uta trāyasva gṛṇato maghono mahaśca rāyo revataskṛdhī naḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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