ऋग्वेद 10.85.15
यदया॑तं शुभस्पती वरे॒यं सू॒र्यामुप॑ ।क्वैकं॑ च॒क्रं वा॑मासी॒त्क्व॑ दे॒ष्ट्राय॑ तस्थथुः॥
yadayātaṃ śubhaspatī vareyaṃ sūryāmupa |kvaikaṃ cakraṃ vāmāsītkva deṣṭrāya tasthathuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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