ऋग्वेद 10.85.22
उदी॒र्ष्वातो॑ विश्वावसो॒ नम॑सेळा महे त्वा ।अ॒न्यामि॑च्छ प्रफ॒र्व्यं१ सं जा॒यां पत्या॑ सृज॥
udīrṣvāto viśvāvaso namaseḷā mahe tvā |anyāmiccha prapharvyaṃ1 saṃ jāyāṃ patyā sṛja ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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