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ऋग्वेद 4.11.4
त्वद् वा॒जी वा॑जम्भ॒रो विहा॑या अभिष्टि॒कृज्जा॑यते स॒त्यशु॑ष्मः ।त्वद् र॒यिर्दे॒वजू॑तो मयो॒भुस्त्वदा॒शुर्जू॑जु॒वाँ अ॑ग्ने॒ अर्वा॑॥
tvad vājī vājambharo vihāyā abhiṣṭikṛjjāyate satyaśuṣmaḥ |tvad rayirdevajūto mayobhustvadāśurjūjuvām̐ agne arvā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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