ऋग्वेद 4.3.7
क॒था म॒हे पु॑ष्टिम्भ॒राय॑ पू॒ष्णे कद्रु॒द्राय॒ सुम॑खाय हवि॒र्दे ।कद् विष्ण॑व उरुगा॒याय॒ रेतो॒ ब्रव॒: कद॑ग्ने॒ शर॑वे बृह॒त्यै॥
kathā mahe puṣṭimbharāya pūṣṇe kadrudrāya sumakhāya havirde |kad viṣṇava urugāyāya reto brava: kadagne śarave bṛhatyai ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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