ऋग्वेद 5.53.2
ऐतान् रथे॑षु त॒स्थुष॒: कः शु॑श्राव क॒था य॑युः ।कस्मै॑ सस्रुः सु॒दासे॒ अन्वा॒पय॒ इळा॑भिर्वृ॒ष्टय॑: स॒ह॥
aitān ratheṣu tasthuṣa: kaḥ śuśrāva kathā yayuḥ |kasmai sasruḥ sudāse anvāpaya iḷābhirvṛṣṭaya: saha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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