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ऋग्वेद 6.16.6
त्वं दू॒तो अम॑र्त्य॒ आ व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॑म् ।शृ॒ण्वन् विप्र॑स्य सुष्टु॒तिम्॥
tvaṃ dūto amartya ā vahā daivyaṃ janam |śṛṇvan viprasya suṣṭutim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंत्वं दू॒तो अम॑र्त्य॒ आ व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॑म् ।शृ॒ण्वन् विप्र॑स्य सुष्टु॒तिम्॥
tvaṃ dūto amartya ā vahā daivyaṃ janam |śṛṇvan viprasya suṣṭutim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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