ऋग्वेद 6.18.15
अनु॒ द्यावा॑पृथि॒वी तत् त॒ ओजो ऽम॑र्त्या जिहत इन्द्र दे॒वाः ।कृ॒ष्वा कृ॑त्नो॒ अकृ॑तं॒ यत् ते॒ अस्त्यु॒क्थं नवी॑यो जनयस्व य॒ज्ञैः॥
anu dyāvāpṛthivī tat ta ojo 'martyā jihata indra devāḥ |kṛṣvā kṛtno akṛtaṃ yat te astyukthaṃ navīyo janayasva yajñaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें