ऋग्वेद 8.22.15
आ सुग्म्या॑य॒ सुग्म्यं॑ प्रा॒ता रथे॑ना॒श्विना॑ वा स॒क्षणी॑ ।हु॒वे पि॒तेव॒ सोभ॑री॥
ā sugmyāya sugmyaṃ prātā rathenāśvinā vā sakṣaṇī |huve piteva sobharī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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