ऋग्वेद 8.46.28
उ॒च॒थ्ये॒३ वपु॑षि॒ यः स्व॒राळु॒त वा॑यो घृत॒स्नाः ।अश्वे॑षितं॒ रजे॑षितं॒ शुने॑षितं॒ प्राज्म॒ तदि॒दं नु तत्॥
ucathye3 vapuṣi yaḥ svarāḷuta vāyo ghṛtasnāḥ |aśveṣitaṃ rajeṣitaṃ śuneṣitaṃ prājma tadidaṃ nu tat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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