वाल्मीकि रामायण 1.1.2
कोन्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो धृढव्रतः॥
konvasmin sāmprataṃ loke guṇavān kaśca vīryavān |dharmajñaśca kṛtajñaśca satyavākyo dhṛḍhavrataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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