वाल्मीकि रामायण 1.1.42
सुतीक्ष्णम् च अपि अगस्त्यम् च अगस्त्य भ्रातरम् तथा ।अगस्त्य वचनात् च एव जग्राह ऐन्द्रम् शरासनम्॥
sutīkṣṇam ca api agastyam ca agastya bhrātaram tathā |agastya vacanāt ca eva jagrāha aindram śarāsanam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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