वाल्मीकि रामायण 1.13.1
पुनः प्राप्ते वसन्ते तु पूर्णः संवत्सरोऽभवत् ।प्रसवार्थम् गतो यष्टुम् हयमेधेन वीर्यवान्॥
punaḥ prāpte vasante tu pūrṇaḥ saṃvatsaro'bhavat |prasavārtham gato yaṣṭum hayamedhena vīryavān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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