वाल्मीकि रामायण 1.18.15
पुष्ये जातः तु भरतो मीन लग्ने प्रसन्न धीः ।सार्पे जातौ तु सौमित्री कुLईरे अभ्युदिते रवौ॥
puṣye jātaḥ tu bharato mīna lagne prasanna dhīḥ |sārpe jātau tu saumitrī kuLīre abhyudite ravau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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