वाल्मीकि रामायण 1.18.50
उवाच परम उदारो हृष्टः तम् अभिपूजयन् ।यथा अमृतस्य संप्राप्तिः यथा वर्षम् अनूदके॥
uvāca parama udāro hṛṣṭaḥ tam abhipūjayan |yathā amṛtasya saṃprāptiḥ yathā varṣam anūdake ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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