वाल्मीकि रामायण 1.18.55
ब्रह्मर्षित्वम् अनुप्राप्तः पूज्योअसि बहुधा मया ।तत् अद्भुतम् अभूत् विप्र पवित्रम् परमम् मम॥
brahmarṣitvam anuprāptaḥ pūjyoasi bahudhā mayā |tat adbhutam abhūt vipra pavitram paramam mama ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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