वाल्मीकि रामायण 1.21.5
त्रस्त रूपम् तु विज्ञाय जगत्सर्वम् महान् ऋषिः ।नृपतिम् सुव्रतो धीरो वसिष्ठो वाक्यम् अब्रवीत्॥
trasta rūpam tu vijñāya jagatsarvam mahān ṛṣiḥ |nṛpatim suvrato dhīro vasiṣṭho vākyam abravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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