वाल्मीकि रामायण 1.39.5
विंध्य पर्वतम् आसाद्य निरीक्षेते परस्परम् ।तयोर् मध्ये संभवत् यज्ञः स पुरुषोत्तम॥
viṃdhya parvatam āsādya nirīkṣete parasparam |tayor madhye saṃbhavat yajñaḥ sa puruṣottama ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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