वाल्मीकि रामायण 1.41.14
यज्ञियम् च हयम् तत्र चरन्तम् अविदूरतः ।ददर्श पुरुषव्याघ्रो दुःख शोक समन्वितः॥
yajñiyam ca hayam tatra carantam avidūrataḥ |dadarśa puruṣavyāghro duḥkha śoka samanvitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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