वाल्मीकि रामायण 1.41.7
देव दानव रक्षोभिः पिशाच पतग उरगैः ।पूज्यमानम् महातेजा दिशा गजम् अपश्यत॥
deva dānava rakṣobhiḥ piśāca pataga uragaiḥ |pūjyamānam mahātejā diśā gajam apaśyata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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