वाल्मीकि रामायण 1.43.15
प्रायात् अग्रे महातेजा गंग तम् च अपि अनुव्रजत् ।गगनात् शंकर शिरः ततो धरणिम् आगता॥
prāyāt agre mahātejā gaṃga tam ca api anuvrajat |gaganāt śaṃkara śiraḥ tato dharaṇim āgatā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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