वाल्मीकि रामायण 1.43.8
हिमवत् प्रतिमे राम जटा मण्डल गह्वरे ।सा कथंचित् महीम् गंतुम् न अशक्नोत् यत्नम् आस्थिता॥
himavat pratime rāma jaṭā maṇḍala gahvare |sā kathaṃcit mahīm gaṃtum na aśaknot yatnam āsthitā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें