वाल्मीकि रामायण 1.45.32
उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा स दण्ड स कमण्दुलुः ।पूर्वम् धन्वन्तरिर् नाम अप्सराः च सु वर्चसः॥
udatiṣṭhat sudharmātmā sa daṇḍa sa kamaṇduluḥ |pūrvam dhanvantarir nāma apsarāḥ ca su varcasaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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