वाल्मीकि रामायण 1.48.27
अथ दृष्ट्वा सहस्राक्षम् मुनि वेष धरम् मुनिः ।दुर्वृत्तम् वृत्त संपन्नो रोषात् वचनम् अब्रवीत्॥
atha dṛṣṭvā sahasrākṣam muni veṣa dharam muniḥ |durvṛttam vṛtta saṃpanno roṣāt vacanam abravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें