वाल्मीकि रामायण 1.55.6
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धम् वसिष्ठम् जपताम् वरम् ।हुम् कारेण एव तान् सर्वान् निर्ददाह महान् ऋषिः॥
abhyadhāvat susaṃkruddham vasiṣṭham japatām varam |hum kāreṇa eva tān sarvān nirdadāha mahān ṛṣiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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