वाल्मीकि रामायण 1.56.15
देव ऋषयः च संभ्रांता गंधर्वाः स महा उरगाः ।त्रैलोक्यम् आसीत् संत्रस्तम् ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते॥
deva ṛṣayaḥ ca saṃbhrāṃtā gaṃdharvāḥ sa mahā uragāḥ |trailokyam āsīt saṃtrastam brahmāstre samudīrite ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें