वाल्मीकि रामायण 1.57.2
प्रत्याख्यातो असि दुर्बुद्धे गुरुणा सत्य वादिना ।तम् कथम् समतिक्रम्य शाखा अन्तरम् उपेयिवान्॥
pratyākhyāto asi durbuddhe guruṇā satya vādinā |tam katham samatikramya śākhā antaram upeyivān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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