वाल्मीकि रामायण 1.63.15
कौशिकी तीरम् आसाद्य तपः तेपे दुरासदम् ।तस्य वर्ष सहस्राणि घोरम् तप उपासतः॥
kauśikī tīram āsādya tapaḥ tepe durāsadam |tasya varṣa sahasrāṇi ghoram tapa upāsataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें