वाल्मीकि रामायण 1.63.17
महर्षि शब्दम् लभताम् साधु अयम् कुशिक आत्मजः ।देवतानाम् वचः श्रुत्वा सर्व लोक पितामहः॥
maharṣi śabdam labhatām sādhu ayam kuśika ātmajaḥ |devatānām vacaḥ śrutvā sarva loka pitāmahaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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