वाल्मीकि रामायण 1.63.18
अब्रवीत् मधुरम् वाक्यम् विश्वामित्रम् तपो धनम् ।महर्षे स्वागतम् वत्स तपसा उग्रेण तोषितः॥
abravīt madhuram vākyam viśvāmitram tapo dhanam |maharṣe svāgatam vatsa tapasā ugreṇa toṣitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें