वाल्मीकि रामायण 1.65.21
स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रम् ते गच्छ सौम्य यथा सुखम् ।पितामह वचः श्रुत्वा सर्वेषाम् त्रिदिव ओकसाम्॥
svasti prāpnuhi bhadram te gaccha saumya yathā sukham |pitāmaha vacaḥ śrutvā sarveṣām tridiva okasām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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