वाल्मीकि रामायण 1.65.2
मौनम् वर्ष सहस्रस्य कृत्वा व्रतम् अनुत्तमम् ।चकार अप्रतिमम् राम तपः परम दुष्करम्॥
maunam varṣa sahasrasya kṛtvā vratam anuttamam |cakāra apratimam rāma tapaḥ parama duṣkaram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें