वाल्मीकि रामायण 1.65.32
यज्ञम् काकुत्स्थ सहितः प्राप्तवान् असि कौशिक ।पावितो अहम् त्वया ब्रह्मन् दर्शनेन महामुने॥
yajñam kākutstha sahitaḥ prāptavān asi kauśika |pāvito aham tvayā brahman darśanena mahāmune ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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