वाल्मीकि रामायण 1.75.17
शिति कण्ठस्य विष्णोः च परस्पर जय एषिणोः ।तदा तु जृम्भितम् शैवम् धनुः भीम पराक्रमम्॥
śiti kaṇṭhasya viṣṇoḥ ca paraspara jaya eṣiṇoḥ |tadā tu jṛmbhitam śaivam dhanuḥ bhīma parākramam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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