वाल्मीकि रामायण 1.75.2
तत् अद्भुतम् अचिंत्यम् च भेदनम् धनुषः तथा ।तत् श्रुत्वा अहम् अनुप्राप्तो धनुर् गृह्य अपरम् शुभम्॥
tat adbhutam aciṃtyam ca bhedanam dhanuṣaḥ tathā |tat śrutvā aham anuprāpto dhanur gṛhya aparam śubham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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