वाल्मीकि रामायण 1.75.27
तत् एवम् वैष्णवम् राम पितृ पैतामहम् महत् ।क्षत्र धर्मम् पुरस् कृत्य गृह्णीष्व धनुर् उत्तमम्॥
tat evam vaiṣṇavam rāma pitṛ paitāmaham mahat |kṣatra dharmam puras kṛtya gṛhṇīṣva dhanur uttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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