वाल्मीकि रामायण 1.76.15
तम् इमाम् मत् गतिम् वीर हन्तुम् न अर्हसि राघव ।मनो जवम् गमिष्यामि महेन्द्रम् पर्वत उत्तमम्॥
tam imām mat gatim vīra hantum na arhasi rāghava |mano javam gamiṣyāmi mahendram parvata uttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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