वाल्मीकि रामायण 2.100.14
कच्चिद्देवान् पितऽन् मातऽर्गुरून् पितृसमानपि ।वृद्धांश्च तत वैद्यांश्च ब्राह्मणांश्चाभिमन्यसे॥
kacciddevān pita'n māta'rgurūn pitṛsamānapi |vṛddhāṃśca tata vaidyāṃśca brāhmaṇāṃścābhimanyase ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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