वाल्मीकि रामायण 2.100.31
कच्चिद्धृष्टश्च शूरश्च मतिमान् धृतिमाञ्छुचि: ।कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्ष: सेनापति: कृत:॥
kacciddhṛṣṭaśca śūraśca matimān dhṛtimāñchuci: |kulīnaścānuraktaśca dakṣa: senāpati: kṛta: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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