वाल्मीकि रामायण 2.100.42
ब्राह्मणै: क्षत्ऺित्रयैर्वैश्यै: स्वकर्मनिरतै: सदा ।जितेन्द्रियैर्महोत्साहैर्वृतामार्यै: सहस्रश:॥
brāhmaṇai: kṣatऺिtrayairvaiśyai: svakarmaniratai: sadā |jitendriyairmahotsāhairvṛtāmāryai: sahasraśa: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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